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Priya Singh

Classics

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Priya Singh

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लक्ष्मीबाई की वीरता

लक्ष्मीबाई की वीरता

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नारी थी, पर चट्टानों सी, आँधी में भी जो अड़ी रही।
ना झुकी थी, ना डरी थी, हर बात पर अड़ी रही।
साहस से जो खेल गई, वो रानी लक्ष्मीबाई थी।
ना फूलों की सेज उनको भाई, ना चूड़ियों की झनकार।
 रणभूमि में जिसकी हुँकार गूँजी, वो थी झाँसी की रानी।

 हाथों में था तलवार, और होठों पर था ललकार।
 “मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी!” कहकर जो उठी अकेली।

 घोड़े की पीठ, तलवार की धार,
धड़कता हृदय, ललकार अपार।

उस एक नारी की हुँकार से, काँपी थी अंग्रेज़ों की टोली। आँखों में था सपना आज़ादी का, सीने में बग़ावत की आग।

 वो ना डरी, ना झुकी कभी, स्वयं चुनी उसने अपनी राह।
घोड़े पर होकर सवार, पीठे बँधा था दामोदर लाल।

 एक हाथ में तलवार थामे, दूजे में था ममता का लाल। ना आँधी से डरी, ना तूफ़ानों से, वो हर विपत्ति पर भारी थी।

 शत्रु की सेना काँप उठी, जब रण में उतरी नारी थी।
वीरांगना थी, रण की रानी, जन-जन की वो अभिमानी।

 नारी नहीं, शक्ति का स्वरूप थी
, हर दिशा में विजय की धूप थी।


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