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Gurudeen Verma

Abstract

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Gurudeen Verma

Abstract

लिखता जा रहा है वह

लिखता जा रहा है वह

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एक रिक्त कागज पर,

गुजरते वक़्त के साथ,

गुजरते लम्हों की जुबां,

आने वाली पीढ़ी के लिए,

उसके भविष्य के लिए भी,

एक अंतहीन कहानी के रूप में,

लिखता जा रहा है वह।


एक अंतहीन मंजिल को,

एक अंतहीन सफर को,

गर्दिश की मुलाकातों को,

रातों की खामोशी को,

आँखों से गिरते ऑंसुओं को,

उत्साहित करने वाले संगीत को,

लिखता जा रहा है वह।


लौटकर आने वाले सावन को,

फिर आबाद होने वाले गुलशन को,

फिर से हंस देने वाली जिंदगी को,

खुदा के शैतानी बंदों के लिए,

जो कर रहे हैं अलगाव पैदा,

कश्मीर को खून से रंगकर,

इन सभी बातों को लग्न से,

लिखता जा रहा है वह।


औरत की शान के लिए भी,

एक मुफ़लिस के दर्द को भी,

बाल मजदूर की मजबूरी को,

कुरूतियों के बारे में भी,

एक विधवा की पीड़ा को,

हर आदमी की जरूरतों को,

लिखता जा रहा है वह।


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