STORYMIRROR

Kundan Kumar Singh

Abstract

4  

Kundan Kumar Singh

Abstract

लड़के भी घर छोड़ जाते है

लड़के भी घर छोड़ जाते है

2 mins
967

एक बेहतरी के तलाश में खुद को बहुत समझाते है 

अपनो को अपना बनाने में खुद को जीना भूल जाते है

उलझी हुई जिंदगी को जी जान से खूब सुलझाते है

सबको खुश रखने के वास्ते लड़के भी घर छोड़ जाते है।


कभी रसोई में कदम ना रखने वाले

आज खुद से खाना पकाते हैं

अपनी मदमस्त दुनिया में जीने वाले

आज सबकी दुनिया को अपना बनाते हैं


उलझी हुई जिंदगी को जी जान से खूब सुलझाते है

सबको खुश रखने के वास्ते लड़के भी घर छोड़ जाते है।

घर मे लड़ के खाना ना खाने वाले आज दोस्तो की

गलती माफ् करके भी उन्हें खिलाते हैं।


फूफा मामा चाचा को अपना बिछावन तक

न देने वाले आज फर्श पे कभी भी सो जाते हैं

उलझी हुई जिंदगी को जी जान से खूब सुलझाते हैं

सबको खुश रखने के वास्ते लड़के भी घर छोड़ जाते हैं।


अपनो की हर बात पर बड़बड़ाने वाले

आज बॉस को धीरे से सॉरी बोल निकल जाते है

झूठ बोलकर जो कल अपनो से लड़ते थे

आज सच पे भी अपनी गलती मान लेते हैं

उलझी हुई जिंदगी को जी जान से खूब सुलझाते है

सबको खुश रखने के वास्ते लड़के भी घर छोड़ जाते है।

याद तो करते है सबको पर किसी को ना बता पाते है

परिवार की जिम्मेदारी तले अपना

हाल हर हाल में बढ़िया ही बताते हैं।


उलझी हुई जिंदगी को जी जान से खूब सुलझाते है

सबको खुश रखने के वास्ते लड़के भी घर छोड़ जाते है।

कभी माँ की हाथों से खाने वाले

आज उनको देखने को तरस जाते हैं।


पापा की आहट सुन झूठी नींद सोने वाले

आज उनकी आवाज को तरस जाते हैं

उलझी हुई जिंदगी को जी जान से खूब सुलझाते हैं

सबको खुश रखने के वास्ते लड़के भी घर छोड़ जाते हैं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract