STORYMIRROR

मधुशिल्पी Shilpi Saxena

Abstract

3  

मधुशिल्पी Shilpi Saxena

Abstract

क्या फिर भी स्वीकार हूँ!

क्या फिर भी स्वीकार हूँ!

1 min
11

हूँ तीक्ष्ण मैं बुद्धि से

लाग लपेट से अंजान हूँ मैं,

दो टूक मे मैं रख देती

अपने दिल की बात को मैं,

दोगलापन मुझे न भाता

अगर मगर है मुझे न आता,

हाँ धनुष की टँकार हूँ मैं

वीरता की हुँकार हूँ मैं,

माना खुली किताब हूँ मैं

क्या फिर भी तुम्हें स्वीकार हूँ मैं!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract