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Bhawana Raizada

Inspirational

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Bhawana Raizada

Inspirational

क्या मुझे हक़ नहीं

क्या मुझे हक़ नहीं

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हाँ मैं मज़दूर हूँ,

क्या मुझे खुश रहने का हक़ नहीं ?


माना सुबह की लालिमा के साथ,

चल पड़ता हूँ ढूंढने रोज़गार,

नयी सुबह की नयी उम्मीद,

क्या मुझे रखने का हक़ नहीं ?


तपती धूप और बहता पसीना,

झुकी कमर उस पर लदा बोझा,

गिलास भर पानी और दो रोटी,

क्या मुझे खाने का हक़ नहीं ?


कड़ी मेहनत के बाद जो मिलती,

खून पसीने की गाढ़ी कमाई,

घर पर पत्नी, बच्चों की आँखें,

क्या मुझे चमकाने का हक़ नहीं ?


न कोई छुट्टी, न कोई आराम,

जीवन में बस काम ही काम,

इस काम के बदले चार खुशी,

क्या मुझे बटोरने का हक़ नहीं ???



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