STORYMIRROR

usha verma

Classics Inspirational

4  

usha verma

Classics Inspirational

कविता अग्नि बिन भोजन नहीं

कविता अग्नि बिन भोजन नहीं

1 min
595

अग्नि है यह देखो

अग्नि के रूप निराले हैं 

कहीं करती उजाले तो

कहीं जला देती कारखाने है

 

अग्नि परीक्षा दी सीता ने भी

यह तो पवित्रता की मूरत है

यह बुराई का नाश करती 

सत्य की सूरत है

 

 वरदान होने पर भी

 होलिका को जला देती है 

 बचाकर पहलाद को

अग्नि सच का साथ देती है


अग्नि बिन भोजन नही

 इस बिन हवन संपन्न नहीं

 दो रिश्तो को बांधती 

इसके बिन सात फेरे नहीं


 क्रोध की अग्नि भड़के जब

 शांत न वो होती है 

कर देती रिश्तो को खाक 

अपनों को अलग कर देती है


 मरने के बाद भी इंसान की

 मुक्ति अग्नि से ही होती है 

अग्नि से ही शुरू होती 

अग्नि पर ही खत्म होती

हम लोगों की जिंदगी।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Classics