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Mayank Kumar

Abstract

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Mayank Kumar

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कुछ तो गया है, कुछ सालों में

कुछ तो गया है, कुछ सालों में

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कुछ तो गया है, कुछ सालों में

जो गया है वह अपना ही था

और जो पराया था वह,

अपनों से भी सगा था

कुछ तो गया है, कुछ सालों में..!


मेरी हस्ती कुछ सालों में कम हुई

ढेरों अपनों का भार है मेरे कंधे पर

जिससे मस्ती जीवन की सस्ती हो गई

खेलता रहा हूं खुद से इतना मैं कि-

खेलने वालों से ज्यादा सुलझ गया हूं

कुछ तो गया है, कुछ सालों में..!


संयंत्रों में खूब फंसा हूं

जितना फंसा हूं उतना हंसा हूं

जिस सारथी को मैंने,

अपने जीवन का रथ हाकने को दिया

उसने ही मेरा सारा सम्मान लिया

कुछ तो गया है, कुछ सालों में..।


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