कुछ बात रह गयी
कुछ बात रह गयी
दिल की अधूरी सी कुछ बात, आम रह गयी
लबों की हँसी साथ, दिल तेरे नाम रह गयी
खोया-खोया सा है मंजर जहां का
रूठी- रूठी मन की ये शाम रह गयी
राहें तकती रही ये आँखे कबसे
कुछ इस तरह दूरियाँ तमाम रह गयी
टूट रहे पत्ते साख से इंताजर में उसके
ढूंढती रही निगाहें यूँ सरेआम रह गयी
गीत गजलों में बसा है तू इस कदर
की ये शब्द तुझ बिन गुमनाम रह गयी।

