STORYMIRROR

Sonali Ghosh

Abstract Drama

4  

Sonali Ghosh

Abstract Drama

किताबों की धूल

किताबों की धूल

1 min
399

कभी बेबाक मिजाज़ की हुआ करती थी।

शब्दों की राजकुमारी बुलाते थे मुझे।


कौन सी कविता जो छुई नही मैने,

दिल से दरिया तक पार कर लिया।


लेकिन कल का आज किसने देखा।

शब्दों से परे थी मेरी हाथ कि रेखा।


जो धूल किताबो से हटानी थी,

वो जिद्दीपन में सिमट के रह गई।


और मैंने बेबाकी को कोसो दूर छोड़

शर्म को अपने गले से लगा लिया।


ना किताबें रही ना कहानियां।

रह गई तो सिर्फ बेइमानियाँ


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract