STORYMIRROR

Sonali Ghosh

Abstract Drama

4  

Sonali Ghosh

Abstract Drama

रिश्तों का सिलसिला

रिश्तों का सिलसिला

1 min
313

फ़िक्र मुझे इस बात की नहीं की

तुम्हें किसी और से प्यार है


फ़िक्र मुझे इस बात की है की

तुम मेरे अपनेपन के आदि हो


मैं दोस्ती के पर्दों में अपनी मोहब्बत छुपा तो लूँ

लेकिन तुम्हारे बटे हुए मन का क्या?


अभी नया नया प्यार है

कल नोक झोक भी होगी,

फिर ढूंढोगे इस दोस्ती के कंधों को

अपना दर्द बाटने के लिए


काफी अजीब सा है ये

रिश्तों का सिलसिला,

बंधनों की बंदिश में

जीने के लिए ही बनी है,

लेकिन उसूलों और दायरों में बटी है.


और अगर ये सब इतना साफ़ और सहज है तो

फिर खुद को चुनना इतना मुश्किल क्यों होता है?


फ़िक्र मुझे इस बात की नहीं की

तुम किसी और से पहचान जोड़ चुके हो


फ़िक्र मुझे इस बात की है की

मैं कब तक तुम्हारी अपनी सी रह पाऊँगी


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract