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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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किसी की गलती

किसी की गलती

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अब्र इतने उदास क्यों हो

क्यूं हो इतना खोए खोए

जैसे रख दी गई शमशीरो पर सर

लगाए गए हो कोड़े जिस्म पर

हर वक्त चेहरे का रंग बदल रहा

कभी कला, नीला,सफेद हो रहा

ऐसी वहसत व्यवहार नहीं देखा

जैसे उसके साथ दुरमा हुआ हो

न जाने क्यों बरस रहा है आज

जो संजोए थे बूंद बूंद करके

धरणी को भी चोट पहुंचा रहा

आग को किसी और पे फेंक कर

ऐसे अपनी आग बुझाता है कोई

नादान जैसी हरकते करता है कोई

कोई नाराजगी है उसे तो बताए हमे

अपनी जख्म को आफाक में दिखाए

पूरे ब्रह्मांड को दी जाएगी हिदायत

सूर्य और चंद्र को भी लगाई जाएगी डांट

क्यूं कोई अफलाक को कोई बुरा भला कहे

ज्यादा दिन तक दुखी रहा तो 

धारा को सैलाब या बनकर बना देगा

किसी और की गलती को कोई और क्यों झेले।

...


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