ख़्वाब
ख़्वाब
कल रात चुपके से एक,
नन्हा सा पंख, मेरी बोझिल पलकों,
पर आ कर ठहर गया,
और बोला मुझसे,
मैं, चुनिन्दा ख़्वाब हूँ तेरा
मैं, अधिकार हूँ तेरा।
तेरे लिए एक सौगात लाया हूँ,
तेरे लिए एक ख़्वाब लाया हूँ,
तेरा ही ख़ास हूँ, तेरा ही कोमल स्पर्श से भरा एहसास हूँ।
देखो तो, वो कैसे चुपके से आया,
और बड़ी ही स्नेह शीतला से,
उसने ख़्वाबों का बसेरा ,
न जाने ,मेरी कोरी आँखों, में कब सजाया।
सुबह सवेरे जब मैं उठी,
तब मां मुझसे बोली,
बड़ी ख़ुश लग रही हो,
कुछ तो नई बात हुई है,
मुझे भी बतलाओ।
मैंने मां से कहा,
कुछ आशाएं जगीं हैं माँ,
कुछ उम्मीदें पली हैं,
कुछ नए हौसले बुलंद हुए हैं मन में,
एक नए दिवस कि शुरूआत हुई है।
मगर मैं थोड़ी घबराई हुई हूं, माँ,
जो कोपल मेरे मन के आँगन, में खिलें हैं,
क्या वो सुंदर फूल बन कर , शाख़ पर खिलेंगे?
क्या मैं अपने ख़्वाबों को ऊंची उड़ान दे पाऊँगी?
तभी पंख मेरे कंधे पर आ कर मुझसे बोला,
तेरे ख़्वाब तेरी पहचान बनाएंगे,
तू आगे कदम बढ़ाएगी , वो तेरी हिम्मत बँधाएंगे,
आज ग़र हौसला कर लेगी तू, तेरे सारे पनपे ख्वाब,
ख़्वाब गाह कहलाएंगे।
तो बस फिर क्या था,
न ताक देखा न तावन,
और खुद से मुस्करा कर बोली मैं,
अब जो भी दिशा हो आगे,
उसे मैं ख़ुशी से अपनाऊँगी,
यही है मेरा ख़्वाब,
गंगा सा पावन,
कोयल की वाणी जैसा मधुर,
और यूँ ही चलते- चलते बस,
बन गया मेरा ख्वाब, मेरा सखा आजीवन।
