खाली नाव
खाली नाव
एकांत में,
जीवन सरिता पर
उतरती एक खाली नाव
जैसे रुकी हुई है
एक छोर पर
न कोई बंधन
न कोई जल्दी
बस स्थिर है।
आसमान भी
नारंगी, पीले नीले
बादलों से भरा
टकटकी लगाए
बस देखता है
शांत पड़ी नाव को।
कोई मल्लाह नहीं,
सवारी नहीं
और न ही कोई चप्पू।
सरकंडे पानी से
सर बाहर निकाले
फुसफुसाहट में
हवा के साथ सरसराते
आपस में
पूछते रहते हैं
कोई तो रहा होगा
जो इसे
यहां तक लाया होगा!
कौन रहा होगा?
क्यों छोड़ गया होगा?
क्या वो आता होगा?
कब तक आता होगा?
या बिसरा दिया गया है इसे
प्रयोग में लेने के बाद !!!
नाव सब देख सुन
असहज हो
डगमगाती है
कुछ पल को
मगर फिर
स्थिर हो जाती है
बुदबुदाती है
हां !
कोई तो!
