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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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जयकारी छंद -अभिमान

जयकारी छंद -अभिमान

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जयकरी छंद ****** अभिमान ******* मत इतना करिए अभिमान। बनो नहीं इतना अंजान।। क्या इतने हो आप महान। जिसको सब लेंगे संज्ञान।। मत करिए इतना अभिमान। कालिख लगा रहे क्यों शान।। यमराज मित्र की मानो बात। दूर रहेगी काली रात।। जितना करते थे अभिमान। समझा नहीं गुरू का ज्ञान।। आज सामने आया सत्य। मिली धूल पहुँची गंतव्य।। करते रहना है अभिमान। लेना नहीं व्यर्थ में ज्ञान।। हमको मिलता है सम्मान। निकल रही क्यों तेरी जान।। सीख रखो तुम अपने पास। यदि तुमको इतना विश्वास।। सबसे भारी मम अभिमान। रहा मुफ्त दे सबको ज्ञान।। जानें क्यों मन बहुत उदास। सोच रहा ले लूँ संन्यास।। कौन मुझे देगा गुरु ज्ञान। जिसको खुद पर है अभिमान।। देखो सत्ता की ये भूख। बिन कुर्सी जस काँटा सूख।। घूम-घूमकर रोती आज। सबसे उत्तम लगता काज।। जिनको रहा बड़ा अभिमान। जनमत का करते अपमान।। धूल धूसरित होकर आज। केवल बचा भौंकना काज।। अभिमानी का होता मान। जाने क्या इसका विज्ञान।। नहीं दंभ से होते दूर। इक दिन होते चकनाचूर।। सुधीर श्रीवास्तव 


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