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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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चौपाई - रंजन

चौपाई - रंजन

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चौपाई छंद - रंजन दीन-दुखी की सेवा करिए। सुखदा भाव गैर में भरिए।। नयनों  में  संवेदन  अंजन। सबसे बड़ा यही है रंजन।। कविता  छंद  गीत  सुखदाई। कलमकार  ने  महिमा गाई।। आप लगा  आँखों में अंजन। बाद करो जी भर कर रंजन।। मातु-पिता  का  करिए  वंदन। अपना  मानो  इनको  चंदन।। शीश हाथ  हो जिसके  नंदन। जीवन का सुरभित हर रंजन।। गर्मी  सबको  है  तड़पाती। दिन दोपहर रात रूलाती।। आये वारिश बनकर चंदन। हर मन प्राणी होगा रंजन।। धर्म-ईमान   है    पूजा   वंदन। लगते   जैसे   शीतल   चंदन।। पाप-कर्म  का अस्थि  मज्जन। कलुषित दुर्जन का हर रंजन।। सुधीर श्रीवास्तव 


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