जमाना
जमाना
विधाता ने बना इंसान जो धरती पे भेजा है।
उसी इंसान को शैतान बनते आज देखा है।
कभी खिलती थी जिन गलियों में कलियाँ प्रेम की प्यारी
उन गलियों को ही श्मशान बनते आज देखा है।
इसी माटी में भाई भी कभी भाई पे मरता था
सभी सुख छोड़ भाई संग सभी कष्टों को सहता था।
जमाने की न जाने कौन सी है आँधी अब आई,
कि भाई को ही भाई से मरते आज देखा है।
