जिओ और जीने दो
जिओ और जीने दो
धर्म के नाम पर क्यूँ बवाल मचा रखा है
एक-दूजे की रीत पर क्यूँ सवाल मचा रखा है
शिवजी पर दूध चढ़ाते हो क्यूँ
किसी भूखे को दुध पिलाते नही क्यूँ
मकबरे पर चादर चढाते हो क्यूँ
तन पर गरीबों के चादर ओढाते नही क्यूँ
सक्रांति आई पतंग उडाते हो क्यूँ
मुक पंछियों की उड़ान चुराते हो क्यूँ
आई ईद पशुओं का बलिदान देते हो क्यूँ
आँसू और चिखे तुम्हे दिखते नही क्यूँ
नहीं जानती इस क्यूँ सवाल का जवाब
पर मर्म तो बस इसका इतना है जनाब
जिओ और जीने दो जीवन के दिन है चार
हरो दूसरों का दुख तुम बेहिसाब
मुस्कान किसी की तुम बन जाओ यूँ
बने खुदा तुम्हारी मुस्कान ज्यों।
