जिंदगी के सफर में
जिंदगी के सफर में
जिंदगी का सफर था,
अजनबियों की पनाह में।
रास्ते तो बहुत थे,
बेइंतहा तलाश में।
कुछ को देखा फूलों से सज़ा तो,
कुछ पर थी काँटो की पनाह।
फूलों पर तो सौगात लगी थी,
इश्क़, मोहब्बत सब सजी थी।
सोचा, खेल ले, काँटों से भरी राहों में,
लेकिन चलने के बाद पता चला,
काँटों ने तो साजिशें रची थी।
उन साजिशों में भी था एक अपनापन,
जैसे-जैसे हम चले,
वैसे-वैसे हमारे कदमों की तस्वीर बनी थी।
