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Harshita Dawar

Abstract

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Harshita Dawar

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झूठी उम्मीद

झूठी उम्मीद

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यूं ही उम्मीद जगाते हैं ज़माने वाले,

कहां लौट कर आते हैं, जाने वाले,

लूट जाती है दौलत भी कुबेर के खज़ाने भी

रोब में जीय थे, गुरूर करते फिरते थे,

कुछ लोग पहचान ने वाले।


मुनासिफ ही था, किस कदर नज़रों

 में गिरते देखते रहे गुरूर सी हस्ती 

बना कर दिखावे की ज़िन्दगी जीने वाले।


महज़ इतिफाक ना समझना,

मखौल उड़ाते रहे, 

कुछ लोग हमेशा उनकी परवरिश 

पर सवाल भी खड़े करते रहे,

उन्ही की पहचान वाले।


हम साथ नहीं कभी खास नहीं,

ना सवाल उठाए ना जवाब मांगे।

मांगे भी तो इल्ज़ाम लगाएं।

ये सिला था साथ चलने का,

चिथडो में उड़ता रहा रिश्ता 

बेबुनियाद रिश्ता दिखावा ही रहा।


अब बाक़ी कुछ नहीं सिर्फ नाम था

रिश्ते निभाने में तुम्हारा कहीं जवाब नहीं था।

कर्म पर विश्वास मेरा है

तू कौन क्या लगता है 

सवाल अब मेरा है।


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