STORYMIRROR

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance

4  

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance

झीना अवगुंठन

झीना अवगुंठन

1 min
565

झीने से अवगुण्ठन के पीछे से 

जब तुम इस तरह मुस्कुराती हो 

हाय, कसम से जान ले जाती हो।

झील सी गहरी बड़ी बड़ी आंखों से 

जब तुम कातिलाना वार करती हो 

तब कसम से जीना मुहाल करती हो। 

लाल सुर्ख लबों पर खेलती हैं जब 

नशीली मुस्कुराहटों की बिजलियाँ 

तब नाजुक सा दिल हलाल करती हो।

होठों के पास जो काला सा तिल है 

उससे जब घातक प्रहार करती हो 

तब, कत्लेआम कर हाहाकार करती हो।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance