जगाया सारी रात
जगाया सारी रात
तुझसे शुरू तुझसे खत्म
नहीं कोई है ये भ्रम
यादों में तेरी मैं खोया रहा
अपलक निहारते मैं सोया रहा
एक भरोसा था जो तुझ पर
वो टूटेगा कैसे
तेरे लिए मैं खोया रहा
तेरी यादों ने मुझको जगाया सारी रात
चांद तारों में भी चेहरा तेरा नजर आता रहा
दर्द जितना भी है सीने में दबा के रखा
तेरी तस्वीर को मरहम समझ लगाता रहा
वीराने में अकेलापन मुझको खाता रहा
तेरा ही चेहरा हरपल नजर आता रहा
अपने दर्द को सबसे छुपाता रहा
कविताओ में सब मैं बताता रहा।
