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Deepali Mathane

Abstract

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Deepali Mathane

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इंतज़ार

इंतज़ार

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ज़िंदगी गुज़र रही थी ज़िंदगी के इंतज़ार में

कुछ खुशियाँ पूछ रही थी पता यूँ हीं तक़रार में 


ख़ोये हुए थे कुछ ख़्वाब दिल-ए-ऐतबार में

इंतज़ार की घड़ियाँ गिन रहे थे दिल-ए-बेकरार में


हंसी -ख़ुशी का ठिकाना बेबस खडा कगार में

ज़िंदगी का फलसफा बयाँ किया मुख़्तसर में


कारवाँ चलता रहा ख़ामोशियों का इकरार में 

ज़िंदगी झेल रही थी बेसब्रियां ज़िंदगी के इंतज़ार में.



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