Saurabh Mishra
Tragedy
क्या करूँ तेरा ख्याल भी नहीं कर सकता मैं
वरना उस आँख में मेरे लिए क्या कुछ न था।
ये भी सच है कि उसने कभी कुछ कहा नहीं
ये भी सच है कि उससे कुछ छुपा न था।
राज
इज़हार
ठोकर खा के गिरने से सिर्फ आहत स्वाभिमान मेरा बचा। ठोकर खा के गिरने से सिर्फ आहत स्वाभिमान मेरा बचा।
मैं वो लड़की हूं जिस पर दरिंदगी के नित नये इतिहास रचे जाते हैं मैं वो लड़की हूं जिस पर दरिंदगी के नित नये इतिहास रचे जाते हैं
ना गुजरता तेरी गलियों से तो अच्छा होता ना आता उस चौबारे पर तो अच्छा होता! ना गुजरता तेरी गलियों से तो अच्छा होता ना आता उस चौबारे पर तो अच्छा होता!
सरस्वती का सदा स्नेह है इन पर तभी बच्चों को संस्कार सिखाती! सरस्वती का सदा स्नेह है इन पर तभी बच्चों को संस्कार सिखाती!
शराब की बोतल बनी मेरे खिलौने, बचपन ही में बचपन छिन गया। शराब की बोतल बनी मेरे खिलौने, बचपन ही में बचपन छिन गया।
मन में कुछ,जुबान पे कुछ दिखता कुछ ,असल कुछ नियत ,निति ,रीती में अंतर। मन में कुछ,जुबान पे कुछ दिखता कुछ ,असल कुछ नियत ,निति ,रीती में अंतर।
कब तुम मेरे प्रति अपने दिल में सम्मान जगाओगे? कब तुम मेरे प्रति अपने दिल में सम्मान जगाओगे?
रिश्तों को संजोये रखने के लिए... उन्हीं रिश्तों में घुटती रही स्त्रियाँ! रिश्तों को संजोये रखने के लिए... उन्हीं रिश्तों में घुटती रही स्त्रियाँ!
देखा हालात आजाद भारत का इक छोटे से पल के दृश्य में । देखा हालात आजाद भारत का इक छोटे से पल के दृश्य में ।
काश, इस दुनिया में हर इंसान बच्चा होता! काश, इस दुनिया में हर इंसान बच्चा होता!
मेरी तरह तुम भी एक कदम उठाना हो सकता है दिन बदलाव जरूर आए ! मेरी तरह तुम भी एक कदम उठाना हो सकता है दिन बदलाव जरूर आए !
कहीं राजभवन को जगमग करता, किसी चिराग़ से कम तो नहीं। कहीं राजभवन को जगमग करता, किसी चिराग़ से कम तो नहीं।
संसद में किसी औरत को कुछ बोलो तो उसे अपमान का रूप दिया जाता है ! संसद में किसी औरत को कुछ बोलो तो उसे अपमान का रूप दिया जाता है !
राजा तो आधुनिकतम बन गया भ्रष्टाचार बेलगाम हो रहा है! राजा तो आधुनिकतम बन गया भ्रष्टाचार बेलगाम हो रहा है!
वक़्त पर कोई भी पहचानता नहीं मानव धर्म कोई भी मानता नही! वक़्त पर कोई भी पहचानता नहीं मानव धर्म कोई भी मानता नही!
मूर्ति नहीं मैं हूं इन्सान क्यों रहा नहीं ये तुमको भान ! मूर्ति नहीं मैं हूं इन्सान क्यों रहा नहीं ये तुमको भान !
देश चल रहा नफरत से ही, फिर कैसे मैं प्यार लिखूँगा । देश चल रहा नफरत से ही, फिर कैसे मैं प्यार लिखूँगा ।
दिन भर अथक कार्य करके जब, हारे थके लौट घर आते। दिन भर अथक कार्य करके जब, हारे थके लौट घर आते।
जिस लिबास ने इज्जत बचाने को तन ढका क्यों उसी को तार तार कर देते हैं लोग जिस लिबास ने इज्जत बचाने को तन ढका क्यों उसी को तार तार कर देते हैं लोग
ये समाज ओर रिवाज सब इक समान हैं पर सोच ओर संस्कार से सब बेईमान हैं।। ये समाज ओर रिवाज सब इक समान हैं पर सोच ओर संस्कार से सब बेईमान हैं।।