हसरतें
हसरतें
मेरी हसरतें
तमाम रातों में दबती गईं।
रूह में सूनापन बनकर उतरती गईं।
स्वप्नों का अधिकार न रखती
ये आँखें
आँसुओं में खुद को भिगोती गईं।
छुटपन की यादें मेरे हाथों से हरपल
रेत बनकर फिसलती गईं ।
जो कभी
रश्क किया करते थे अपनी नसीबी पर
हरपल बदनसीबी में वो तब्दील होती गईं।
