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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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हर पहर

हर पहर

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हर पहर सहर का नहीं होता

रात को रात न कहे ऐसा भी नहीं होता ।


दिन का रात पर कड़ा पहरा है

फिर भी रात का असर कितना गहरा है ।


किया है इस पर बहुत विचार

क्या है इसका कहीं कोई उपचार।


विवश हुए थे जरूर लेकिन वश में नहीं हुए

दुनिया के हाथों खिलौना कभी नहीं हुए।


बोते रहे खोखले बीज कि फसल उगेगी

बाँटते रहे गम फिर खुशी कहां मिलेगी।


किताब खुलते ही विश्वास जगता है

हर पन्ने पर सखा भाव सजता है।


जीवन का सार जब किताबों में मिलता है

आपाधापी में क्यों फिर सिर खपता है ।


जिंदगी के द्वार पर

कभी रास्ते मिल जाते हैं

कभी रास्तों में हम खो जाते हैं

 मंजिल का तो पता नहीं

रास्तों में ही हम लेकिन

उलझ जाते हैं।


मां का दुलार हो

पिता पालनहार हो

बस ऐसा ही संसार हो

देश का दुलार हो

सरकार पालनहार हो

बस ऐसा ही व्यवहार हो ।


कागज की कश्ती में

अरमान गोते लगाते।

पर पतवार बनी जब कलम 

अरमानों को दिशा दे पाते ।


जिंदगी अपने कदम यूं ही नहीं बढ़ाती

स्याही से है हर पदचिन्ह बनाती।


 हर हर्फ जिंदगी को सजाता है।

 हर अक्षर शब्दों का गहना बन जाता है ।


कागज पर लिखकर कई दर्द मिट जाते हैं।

आंखों की कश्ती में आंसू सूख जाते हैं।


अल्फाजों को कागज पर उतारते- उतारते

न जाने कब स्याही सूख गई।

कलम लेकिन चलती रही ।

कोरे कागज पर

एहसासों को सहेजती रही।


शब्दों से सजी कागज की कश्ती थी ।

गहरे पानी में भी डूब न पाई।


 नकाब ओढ़े जिंदगी कब तलक बढ़ेगी।

 हर राहगीर नासमझ नहीं होता।…


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