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हिमांशु उनियाल पण्डित

Abstract

5.0  

हिमांशु उनियाल पण्डित

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हमसफ़र ज़िन्दगी

हमसफ़र ज़िन्दगी

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ज़िंदगी में कोई साथ दे ना दे

ये ज़िन्दगी मरते दम तक साथ देगी

हमसफ़र मेरा हो ना हो

सबसे बड़ी हमसफ़र ज़िन्दगी।


जो हर मोड़ पे नया सिखाती है

तजुर्बों से रक़ीबों में फर्क दिखाती है

करती है अपना हक़ शिद्दत से अदा

है ये असल, ना है दिल्लगी,

सबसे बड़ी हमसफ़र ज़िन्दगी्


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