STORYMIRROR

हिमांशु उनियाल पण्डित

Others

4.8  

हिमांशु उनियाल पण्डित

Others

आम के बगीचे वाळी

आम के बगीचे वाळी

1 min
476


बचपन में आम के पेड़ पर खूब मस्ती की थी

छुपन छुपाई से ले के पकड़ा पकड़ी तक की हस्ती थी

उस वक़्त ज़िंदगी भी तो बेबाक हँसती थी

अब वो दिन नहीं हैं, वो आम का बगीचा नहीं है

पर मस्त हवा का झौंका सा मेरा मन यहीं है।


फ़िर एक दिन किसी आम के बगीचे वाली से बात हुई

आम सुनते ही मेरे दिले जमीं पे बिन बादल बरसात हुई

कहीं ना कहीं फ़िर से बचपन याद हो आया था,

वो दिन जब मैं पेड़ पर चढ़कर आम तोड़ लाया था

मुझे बचपन याद दिलाने वाली है, वो आम के बगीचे वाली है


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन