STORYMIRROR

हिमांशु उनियाल पण्डित

Others

4.3  

हिमांशु उनियाल पण्डित

Others

पुञ्ज

पुञ्ज

1 min
555


हो गया है दुःख अमावस की रात सा घना

खुशियों के दीप से इसे रोशन ज़रा सा कर दो

इक दिया है इक अँधेरी रात है घनी बड़ी

दोनों में से जीते जो वो आस है सबसे बड़ी

देखना है दीये के आगोश में खो जाये रात

या दीया इस रात के आगोश में खा जाये मात

अपना अपना मर्म है भयभीत या भयहीन हो

वक्त सबका आएगा बुरा आज तो कल हो भला

निशाकर लाचार है जो आज अपने मार्ग पे

आएगा लेकिन वही कर जायेगा रोशन जहाँ

प्रेरणा ले उस शशि से दीप बनकर आ यहाँ

पुंज है तुझमें प्रकाशित ढूढ़ता तू फिर कहाँ

ढूढ़ता तू फिर कहाँ....।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन