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Anand Kumar

Fantasy

4  

Anand Kumar

Fantasy

गज़ल

गज़ल

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बुलंदियों से उतर कर जो, अपने ही घर नहीं आता

जाने क्यों फिर वो, ज़माने में भी नजर नहीं आता


जब से दीवार खड़ी हुई घर में, जाने क्या बात है

दोस्त जो भी गया उधर, फिर इधर नहीं आता


बयान बदल जाया करते हैं यहाँ हालात देखकर

यक़ी कीजिये अब मुझे यक़ी किसी पर नहीं आता


दायरों के कफ़स में कैद ,जी सके न मर सके

तुम्हें इस के सिवा रास कोई और ज़हर नहीं आता


पर्दा डाल देते है इक दूसरे के सच पे हम, तब ही

मुझे ये नजर नहीं आता तुझे वो नजर नहीं आता


न जाने क्या कहा इस राह से तपती धूप ने 'आनन्द '

तेरे साये को पनाह देने, कहीं कोई शज़र नहीं आता


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