**गर्मी की धूप**
**गर्मी की धूप**
कितनी लापरवाह गर्मी की धूप है
सूरज ने दिखाया आज कैसा रूप है
पारा पारा करते बिखरा सबका जीवन
मन के आगे छाया रहता अंध कूप है।
सूखे ताल,सूखी नदियाँ सूखे है सारे पनघट
धरती का सीना चिर गया दिख रहा विकट रूप है।
अंजुरी भर ही पिलूँ, जल की प्यास है
छांव न मिली कोई ,नीड़ की तलाश है
भटक रहा पनाह में मन पाखी सा मेरा
मरुस्थल में भी होता जीव का स्वरूप है।
कितनी लापरवाह गर्मी की धूप है
सूरज ने दिखाया आज कैसा रूप है।।
तरुणाई बोल उठी ये कैसी गूंज है
अरुणाई की छाई हर तरफ धुंध है
बौर आई अमिया कोयल कूक उठी
गर्मी के मौसम में "नीतू"दहका मधुरूप है
कितनी लापरवाह गर्मी की धूप है
सूरज ने दिखाया आज कैसा रूप है।
