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Janardan Gore

Abstract

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Janardan Gore

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गरीबी या लाचारी

गरीबी या लाचारी

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इंसान को बहुत कुछ

सिखाती है गरीबी

कभी समजदारी, तो

कभी सिखाती लाचारी//१//

बहुत कुछ सहना पड़ता

देखके भी चुप रहना पड़ता

मन उड़ने का प्रयास करता

मजबूरी मे चुप रहता //२//

बुरी हालत में जीते हैं गरीब

खुद जाने खुद की तकलीफ

साथ उनका कोई देता नही

बात मन की कोई समझता नही//३//

बस एक होती उनकी कमजोरी

दूर नही होती गरीबी और लाचारी

खामोशी लेकर जीते हैं सब

कबतक इमतेहान लेगा रब //४//



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