ग़ज़ल
ग़ज़ल
मीर, ग़ालिब, फ़ैज हों अश्आर में तेरे
ये जहाँ क्यों ढूँढता किरदार में तेरे।
बढ़ रहा हूँ मंज़िल-ए-मकसूद की जानिब,
लग रहा इकरार है इनकार में तेरे।
कम नहीं जज़्बा चिरागों का कभी होतां
दम नहीं है ऐ हवा तक़रार में तेरे।
सिर्फ़ मैं ही तो नहीं तारीख कहती है,
झुक अदब आया नहीं दरबार में तेरे।
फ़र्ज पर क़ुर्बान हूँ पर की नहीं ख़्वाहिश,
नाम मेरा छप सके अख़बार में तेरे।
इश्क ये तू सोच ले कैसा तवाज़ुन है,
हुस्न आया कब दिल-ए-मनुहार में तेरे।
