गीत लिखा है
गीत लिखा है
तुम्हारे लिए मैंने एक गीत लिखा है,
गीत में मैंने तुम्हें बेहद खूब लिखा है,
इतना खूब कि उम्र के आखिरी दौर में
जब लिखूँगा, तो उसमें भी तेरा रुआब!!
फिर भी कहीं छुट कर रह जायेगा।
लिखा है तेरी झील सी शांत आँखों को,
जिनमें उतर कर ये मन बेचैन सा है।
ढलती हुई शाम को तेरे गालों की
लालिमा लिखा है,
और आसमां पर उतरी आकृति को छलावा लिखा है।
शिव की घनघौर लटाओं जैसा!!!
बना हुआ तेरे बालों का जुड़ा लिखा है।
आँखों की पुतलियों से झांकता हुआ!
आकाश गंगा से भरा बृह्मन्ड लिखा है।
बांधने की तुमको अनेक उपमाओं में
कोशिश की है,
गीतों के शब्द जाल मे तेरी एक तस्वीर बनाई है,
गीत की हर लय में तुझे उतारा है,
और बदन तेरा संगेमरमर सा लिखा है।
पर तुम्हारे नथ से लेकर पैरों में सजी महावर तक मे उलझकर रह जाता हूँ!
एक को संभालूँ तो दूसरे में खो जाता हूँ।
गीत मे ही चाहा है तेरे काँधे पर सर रखना,
फिर उतार कर तुझे अपने अल्फ़ाजों में!
कैसे शुरू हुआ मेरी मोहब्बत का सफ़र लिखा है।
तेरे बालों की जिस लट् में रह गई
मेरी ये जिंदगी उलझकर!
गीत की उस पंक्ति मे सारा जिक्र लिखा है।
तेरे चंचल मन के इंतज़ार में,
गुज़ार रहा हूँ मै कैसे रातें!
आँखों से छलक कर रुखसार पर ढलकी
बूंदों का सबव लिखा है...
