STORYMIRROR

डॉ. अरुण कुमार निषाद

Abstract

4  

डॉ. अरुण कुमार निषाद

Abstract

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min
381

दिलों की धड़कनें अब भी तुम्हारा नाम लेती हैं

तड़पने का तेरे ग़म में यही ईनाम देती हैं।


अजब का इश्क इनको हो गया है नाम से तेरे

न कहना मानती हैं नाम ये मुदाम लेती हैं।

मुदाम=निरंतर


कभी जब सोचता हूं नाम उनका गीतों में लिख दूं

मेरे लिखने के पहले वो लगा विराम देती हैं।


मेरे मन के शिवाले में अभी भी मूर्ति है उनकी

खुद से क्यों दूर होने का मुझे पैगाम देती हैं।


उनकी झूठी वफाओं का खुलासा करना जब चाहूँ

'अरुण' झूठा मुझी पर वो लगा इल्जाम देती हैं।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract