STORYMIRROR

shikha rani

Abstract

3  

shikha rani

Abstract

ए-जिंदगी उड्ँगी मैं

ए-जिंदगी उड्ँगी मैं

1 min
263

जिंदगी कहती हैं, अब नहीं

बहुत तकलीफ़ होती है,


इस जिंदगी से, अब रुक जा

मैंने कहा ए-जिंदगी,


चींटी जब पर्वत पर चढ़ती है

वह गिरती हैं, संभलती है


और फिर चलती है

मैं भी आगे बढ़ूँगी,


गिरूँगी, सम्भलूंगी पर

मैं रुकूँगी नहीं, उडूंगी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract