दूर बस दूर
दूर बस दूर
ऋतुएं बदल रही हैं!
स्व -गति चल रही हैं!
बिना कोई लागलपेट!
सृजन या मटियामेट!
गर्मी,बरसा व सर्दी!
बिना रंग -राग बेदर्दी!
ये मदमस्त ऋतुराज !
मिलन विरह अंदाज!
ठहरे गये दुख आकर!
बिन बात बतलाकर!
लेते न जाने का नाम !
गायब हुआ विश्राम!
चरम सुख जब होता!
गहन पीड़ा न्यौता!
फागुन हो या सावन!
पार -परे मनभावन!
क्षणिक नहीं शाश्वत!
जो सनातन आश्वस्त!
परिधि से केंद्र आना!
"स्व" में ठहर जाना!

