STORYMIRROR

AMEET COOMAAR

Abstract Others

3  

AMEET COOMAAR

Abstract Others

दरख्तों की सिस्कियाँ

दरख्तों की सिस्कियाँ

1 min
428

गिरी दीवार को फिर क्यूं उठाये जाते हो

सरे बाज़ार नफरतों की पौध क्यूं लगाते हो

पैग़ाम मोहब्बत का परिंदे लाते है

जाल बिछा के उड़ने पे रोक क्यूं लगाते हो।


मौसम बहारों के बगीचों में रंगीन हुए

चाय के प्यालों में किस्से दो तीन हुए

तितलियों के परों पर इंद्रधनुष खेले

दिलों के रास्तों पे क्यूं न हम साथ चलें।


आज दरख्तों से फ़िर मिलना चाहा

फ़साना पास बैठकर सुनाना चाहा

कभी तेज़ कभी मंद थी उनकी साँस

यार पुराना मिलकर जैसे सिस्काया

इस फरिश्ते के जख्मों पे मरहम रख दूॅं

जैसे कहता हो न जाओ मुझे आज छोड़कर।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract