STORYMIRROR

Vandana Kumari

Abstract

4  

Vandana Kumari

Abstract

दर्द असहनीय

दर्द असहनीय

1 min
109

तड़प उठी है अब रूह भी, 

व्यथित हो रहा मन है

किसी का लाल भूखा है, 

किसी की मां प्यासी है


पांव के ये छाले, 

अपना दर्द सुनाते हैं

हद हो गई है अब, 

हम अपने गांव जाते हैं


सड़क पर जो बिखरा है, 

वह अरमान है दिल का

किसी की चूड़ी टूटी है, 

कोई आंचल सिसकता है


पत्थर बन तमाशा देखे, 

बहती बस अश्रुधारा है

अब तुम ही बता "वंदे",

क्या यह प्यारा हिंदुस्तान हमारा है ?


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract