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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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दोहा -श्री जी कनक प्रभा जी

दोहा -श्री जी कनक प्रभा जी

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दोहा - श्री जी कनक प्रभा  कला  जन्म से थी  हुईं, जीवन  की  मुस्कान। कनक प्रभा हो पथ चली, शासन माता जान।। सूरजमल  जिनके  पिता, छोटी  बाई  मातु। कनक बन गई एक दिन,सोना जैसी धातु।। श्री तुलसी ने कला को,  दिया नया था नाम। कनक प्रभा की कीर्ति से, फैला नव पैगाम।। तेरा पंथी साधिका, तुलसी दीक्षा पाय। साध्वी प्रमुखा रूप में, पद को किया सुभाय।। कनक प्रभा जी साधिका, बहुगुण की थीं खान। जैन,  भिक्षुणी,  लेखिका,  सन्यासी   सम्मान।। कनक प्रभा जी का हुआ,  अमर  जगत  में  नाम। बिना  मोह  माया  किया,  रखे  भाव  निष्काम ।। तुलसी  कृतियों  का  किया, सदा  आपने   गान। तनिक नहीं था आप में,  लोभ, मोह अभिमान।। सकल जगत में आपका, बड़ा मान सम्मान। चरण वंदना सब करें, कृपा आपकी जान।। शासन माता को करूँ, नमन जोड़ कर हाथ। सूक्ष्म  रूप  में  ही  सही, रहो  हमारे  साथ।। महिलाओं को कनक ने, नई दिखाई राह। उन्नति पथ पर ले बढ़ें, ये थी उनकी चाह।। साध्वी  जी  ने गढ़  दिया, एक  नया  प्रतिमान। विविध पदों पर काम कर, रहीं सदा गतिमान।। शासन माता कनक ने,  पाया कउत्तम  स्थान।  इक्यासी की उम्र में,  जीशवन का अवसान।। धन्य-धन्य जीवन हुआ, यश गाथा उत्कर्ष।  जिनसे  प्राणी  सीखते, क्या होता है हर्ष।। तेरापंथी   साध्वी,   ऊँचा   तव   स्थान। तीस वर्ष में मिल गया, साध्वी प्रमुखा मान।। कनक प्रभा जी आपको, शत-शत बार प्रणाम।                                       जैन  धर्म  को  आपने,   दिया  नया  आयाम।। महरौली में आपका, हुआ देह का त्याग। जैन धर्म के लोग सब, मानें इसे प्रयाग।।  दिव्या पर करिए कृपा, कनक प्रभा जी आप।    और  निधी  का  संग  में,  हरो  शोक  संताप।।         सुधीर श्रीवास्तव  


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