STORYMIRROR

sai mahapatra

Abstract

3  

sai mahapatra

Abstract

धूल

धूल

1 min
285

बेशक तुझे दिए हुए 

मेरे उस खत में धूल जम गई होगी

फिर भी तू उसे सभाल के रखी होगी


रोज उसे देखकर मेरा

चेहरा याद कररही होगी

तेरी आंखों से आंसू मेरे जज्बातों को

उस खत से मिटाने की

नाकाम कोशिश कर रहे होंगे।


फिर तेरा दिल मेरे साथ बिताये

उस लम्हे को याद कर रहे होंगे

फिर मेरी याद आ रही होगी।


बेसक मेरे दिए हुए उस खत में

धूल जम गई होगी

फिर भी तू उसे संभाल के रखी होगी।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract