STORYMIRROR

Abhilasha Chauhan

Abstract

4  

Abhilasha Chauhan

Abstract

धुरी इस सृष्टि की

धुरी इस सृष्टि की

1 min
322

अनीतियां

कुरीतियां

ये रूढ़ियां

देती हैं दंश जब,

ममतामयी

कोमलांगी

स्नेह निर्झरणी तब,

बन ज्वालामुखी।


अंतस में जिसके

पिघलता है लावा,

जूझती परिस्थितियों से

बनती जाती लौह सम,

हारती नहीं

भागती नहीं

करती सामना।


वक्त के बेरहम हथौड़ो से

उसके अंदर का

पिघलता लोहा

पा लेता है आकार,

धैर्य से वह लेती काम

बन जाती है लौह चट्टान।


वह जो धुरी है सृष्टि की

संचालिका इस सृष्टि की

जो टूटती नहीं

जो झुकती नहीं

गढ़ती नए आयाम

विश्व-पटल पर।


हां, वह नारी है

नहीं अबला,

न बेचारी है

वह परिस्थितियों से,

कभी नहीं हारी है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract