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Deepa Dingolia

Abstract

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Deepa Dingolia

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देवनदी गंगा

देवनदी गंगा

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शिव जटाओं से निकल

सदानीरा अविरल

खंडित-विखंडित बहती है।


पाप और पुण्य के जल से

जीवन मुक्त यह करती है

सदियों से धरोहर है हमारी

शांत चित्त आगे बढ़ती है ।


अंतिम श्वास मिले जल इसका

ऐसा भाग्य होना चाहिए

वर्चस्व अपना इसमें मिले

और 

नज़दीक इसके ही

अंतिम प्रणाम होना चाहिये ।


हिम से चल पहुंची यह हम तक

पावन, पवित्र, शीतल जल ले कर

स्वार्थ में मानव ने अपने

दोहन कर लिया इसका हर एक कण।


अपना मैला तो सब धोलें 

फिर भी करती कल्याण है

हो गयी मैली ये हम से

अपनी छवि देख कर हैरान है।


पीढ़ी दर पीढ़ी

कर्जदार है इसकी

अब तो चिंतन होना चाहिए

श्र्वेत ,धवल ,निर्मल,चमकीला 

जल हो अब इसका

बस एक यही जन-गान होना चाहिए।  


संस्कार है, त्यौहार है,

गीत है, श्रृंगार है

निर्मल, भागीरथ 

देश की गरिमा

हरिद्वार, प्रयाग,

काशी का सम्मान है।


यूँ ही जल नहीं धरती पर

अमृत अट्टहास करता है

जननी जीवन की 

और  सृष्टि की

हे "माँ गंगे" ये भारत 

तुम्हें

शत-शत प्रणाम करता है।


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