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Shishpal Chiniya

Abstract

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Shishpal Chiniya

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देवांशी

देवांशी

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एक नाजुक -फूल; घर की वाटीका में

रोशनी हो चांद की अधेंरी घाटीका में।


माँ ने उसमें बचपन पिता ने देखी जिदंगी

उसकी गुस्ताखी से कैसे किसी की बंदगी ।



एसे चले जैसे वो हो किसी अनन्त में 

बोले यों जैसे नन्ही काकुल वसंत में।



मां के आंचल को शीश पर जब रखा 

ज्यों सावन बादल ने सूरज को ढका


बेटी नहीं जैसे वो हो कोई उर्वशी हौ

ज्यों आँगन में स्वर्ग की दुनीया बसी हौ।


चन्दा के प्रकाश में देवांशी यूँ बैठी है

कितने रंगीन सपने संजोये बैठी है ।



रोना-रूठना उसकी इक आदत है

हँसाना-मनाना उसकी ईबादत है।



तभी तो कहे मेरा है मान-सम्मान 

वो मेरी बेटी है वो मेरा अभिमान ।


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