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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Tragedy

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Tragedy

दौलत का साम्राज्य

दौलत का साम्राज्य

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242

जिंदगी भर दौलत कमाने में लगे रहे 

भांति भांति की योजनाएं बनाने में लगे रहे 

रुपये पैसों का पहाड़ खड़ा कर लिया 

धन दौलत का साम्राज्य बड़ा कर लिया 

घर परिवार पर कभी ध्यान नहीं दिया 

सुख क्या होता है इस पर ज्ञान नहीं किया 

पैसे का अहंकार सिर चढकर बोलने लगा 

लोगों को पैसों की तराजू में तौलने लगा 

बुरी संगत से औलादें बिगड़ने लगी 

बात बात पर उसी से अकड़ने लगी 

बुढापे में कोई साथ देने वाला नहीं था 

दौलत का साम्राज्य साथ जाने वाला नहीं था 

दो गज कफन भी श्मशान तक साथ है 

उसके बाद कुछ नहीं, सिर्फ खाली हाथ हैं 

दौलत के बजाय गर प्यार का खजाना होता 

तो आज उसके लिए भी ये सारा जमाना रोता। 



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