STORYMIRROR

Ranjeet Singh

Tragedy

4  

Ranjeet Singh

Tragedy

बालश्रम

बालश्रम

1 min
282

जब छोड़े सूरज अपना बिस्तर

पर अब भी है कोहरा सड़कों पे

जा रहे हैं वो नन्हे नन्हे

सोचू कैसा बोझ है इनपे।


नजर आते हैं हमउम्र उनके

पढ़ने को जाते हुए

पर वो जा रहे हैं बोझा ढोने

टोलियां बनाते हुए।


झूलना था झूले पे

उन नादानों को इस तरह

खेलते हैं अनोखे खेल 

हमउम्र उनके जिस तरह।


दूरियां जो बन गयी हैं

पुस्तकों से हाथों की

सोचता हूँ तो उड़ जाती है

नींद मेरी रातों की।


क्या अप्पूघर भी बंद है

क्या चिड़ियाघर भी बंद है

होती जहां पे शैतानियां वो

सिनेमाघर भी बंद है। 


बन्द हैं गर ये सभी

देश पतन की ओर जाएगा

फिर नेता होंगे बहरे 

और कानून अंधा बन रह जाएगा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy