STORYMIRROR

छाता

छाता

1 min
934


छाते से बाहर ढेर सारी धूप थी

छाता-भर धूप

सिर पर आने से रुक गई थी।


तेज़ हवा को छाता

अपने-भर रोक पाता था।


बारिश में इतने सारे छाते थे

कि लगता था कि लोग घर बैठे हैं

और छाते ही सड़क पर चल रहे हैं।


अगर धूप, तेज़ हवा

और बारिश न हो

तो किसी को याद नहीं रहता

कि छाते कहाँ दुबके पड़े हैं।।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Drama