STORYMIRROR

Nand Lal Mani Tripathi pitamber

Inspirational Others

4  

Nand Lal Mani Tripathi pitamber

Inspirational Others

चौथे पन का प्यार जरूरत या जज्बा

चौथे पन का प्यार जरूरत या जज्बा

3 mins
410

1-रघुनंदन की जिंदगी 

मंदिर की वह औरत 


मंदिर जाते सुबह शाम

ईश्वर का मांगते आशीर्वाद

जीवन में कोई क्लेश नहीं

धन दौलत पर्याप्त।।

जीवन का चौथा पन

ढलती जीवन की शाम।।

बस एक था मलाल 

जिन संतानों की खातिर

खून पसीना एक किया

सफेद हो गए बाल।।

छोड़ दिया साथ वासी से

प्रवासी हो गए औलाद।।

विदेशी बीबी मेम क्या

जाने माँ बाप का दर्द हाल

पोते पोती को पता नहीं 

क्या होता दादा दादी का

रिश्ता समाज।।

पत्नी साथ छोड़ गई

याद नहीं बीत गए 

कितने साल।।

सुबह शाम मंदिर में

ईश्वर से करते यही सवाल

किया कोई पाप नहीं ना

दिया किसी को दुःख पीड़ा

फिर जीते जी ही नरक जीवन

क्यों बदहाल।।

प्रतिदिन सुबह शाम मंदिर

जाते देखा करते हम उम्र

एक औरत बैठी रहती उदास।।

मन कहता सुबह शाम पूछूँ कौन

कहाँ से आयी मंदिर में बैठी रहती

सुध बुध खोए बेहाल।। 

लेकिन कुछ भी पूछने से पहले

ही हिम्मत जाती हार।।

आते जाते एक दिन पूछ लिया

उस औरत से सवाल कौन कहां

से आई क्यों रहती उदास।।

मेरे प्रश्नों को सुनते ही उस औरत

की आंखों से निकल पड़ी गंगा 

जमुना की धार।।

कुछ ना बोली रोती ही रह 

गई बहुत कोशिश जिद करने

पर उसने भी खोली जुबान।।

गर जानना चाहते हो तो सुनो

आज अब मैं हूँ कौन?

मैं अपने साजन की सजनी हूं

उसके सात फेरों की संगिनी हूँ।।

मेरे सुख की खातिर सांसे धड़कन

जीता मर्यादा के कलयुगी राम की

बेवा पत्नी हूँ।।


2--रघुनंदन सुनैना की मुलाकात


मैंने भी सीता राधा रुकमणी जैसा

अपने प्रिय प्रियतम का साथ निभाया

बाबुल पीहर दोनों कुल का मान बढ़ाया।।

मेरे भी दो पुत्र पढ़े लिखे होनहार 

युग समय के प्रेरक प्रेरणा धन वैभव

में परिपूर्ण।।

मर्यादा का राम सरीखा शौहर असमय

साथ छोड़ गया समय काल का पहिया

घुमा खुद के बेटों ने वृद्धाश्रम छोड़ दिया।।

वर्षों हर माह वृद्धाश्रम का देते ख़र्च

फिर दोनों मेरे पुत्रों में ही हो गयी होड़।।

तुम दोगे नहीं तुम दोगे, माँ बाप ने 

तुझको ही सब कुछ दिया मैं तो

अपनी मेहनत से अपना साम्राज्य 

खड़ा किया ।।

दोनों सन्तानों के द्वंद्व होड़ में वृद्धाश्रम

का हो गया बहुत बकाया झूठे बर्तन

माँज कर जिसे मैंने रोते मरते चुकाया।।

अब गयी हूँ थक हार हिम्मत दे गई जवाब

अपने ही जिगर के टुकड़ों ने

कभी नहीं लिया माँ का हाल।।

हर शब्द के साथ उसकी वेदना

का बयाँ कर रहे थे अश्रु धार।।

बोला रघुनंदन मेरा नाम मैं भी

आपकी ही तरह अकेला अपनी

ही संतानों का मारा कंगाल।।

अपने आंसू पोंछती बोली सुनैना

मेरा नाम मंदिर में पत्थर की मूर्ति

कहते भगवान के सामने अपने लिये

न्याय मांगती।।


3-रघुनंदन और सुनैना का चौथेपन

   का प्यार


रघुनंदन बोले सुनो सुनैना 

हम दोनों ही एक ही हालात

के मारे हम दोनों एक ही कस्ती

के सवार।।

कहते है भगवान के दर दरबार

में देर है अंधेर नहीं देखो क्या

मेरा तेरा सौभाग्य।।            


हम दोनों ही संतानों की 

मार वार से घायल समान।।

सम्मान की कर रहे तलाश

चलो ईश्वर की भी मर्जी है

उसका ही आदेश पत्थर जैसा

बैठा खुद पर मोम मधुर सर्वज्ञ

सर्वग्राह्य उसका न्याय।।

वह तुममें भी मुझमें भी

देख रहा सारा कायनात।।

 रघुनंदन सुनैना हो गए 

एक दूजे के साथ प्रतिदिन

मिलना शुरू हुआ सुबह शाम।।

सुख दुख बाटते मिलते जुलते

ना जाने कब हो गया एक दूजे

में प्यार उम्र के चौथेपन में प्यार

चढ़ा परवान।।

दोनों ने फिर लिए फेरे सात

सात जन्मो के निर्वहन की

प्रतिज्ञा दोनों के लिये आवश्यक

नितांत।।

दोनों की संतानें करती रही

परिहास खड़ा हो गया जमाना

रघुनंदन सुनैना के प्यार की 

बनकर दीवार।।

दोनों की संतानों ने क्षमा

याचना मांगी लाखों किया

गुहार नए प्यार के घरौंदे रघुनंदन

सुनैना ने देखा जीवन की खुशियों

का संसार ।।

प्यार में वासना का कोई 

स्थान नहीं एक दूजे की

खातिर जीना मरना प्यार

सच्चा जीवन सार।।

ना जाने दुनिया में रघुनंदन

और सुनैना जीवन की सांसे

हार गए जिनकी खातिर जीते

रहते वे ही उनको मार गए।।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Inspirational