चौपाई छंद
चौपाई छंद
चौपाई छंद सारा जग परिवार हमारा। अब कैसा चाहें विस्तारा।। धन वैभव जब काम न आये। निज परिवार साथ हो जाये।। ऊँच नीच सब व्यर्थ की बातें। जीवन की कलुषित सौगातें।। जग परिवार एक आधारा। इसमें खुशियां बने सहारा।। भेदभाव जब कुंठित करता। तब प्राणी खुद भी डरता।। छोटे-बड़े सभी हैं इसमें। अपनापन भी होता सबमें।। जब हम सबको अपनाएंगे। खुशियाँ जीवन भर पायेंगे।। सबका बनिए आप सहारा। बने रहोगे जग का प्यारा।। सुधीर श्रीवास्तव
