चांद
चांद
जब भी तन्हा कोई शजर देखा
उसकी आँखों मे एक डर देखा
दौड़ता भागता नगर देखा
ख़ुद में उलझा हुआ बशर देखा
जो कि मुमकिन न था मगर देखा
गुल के अंदर भी कुछ शरर देखा
कुछ दरारें पड़ी हैं पत्थर में
अपनी उल्फ़त का ये असर देखा
अपनी नज़रें भी सौंप दी तुझको
तूने चाहा जिधर उधर देखा
दीप उम्मीद के जले फिर से
रुक के तुमने जो इक नज़र देखा
देखने दे मुझे सहर को अब
चांद तुझको तो रात भर देखा
मच गईं हलचलें हरिक जानिब
जब भी उसने जिधर जिधर देखा।
