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Kanchan Jaiswal

Romance Others

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Kanchan Jaiswal

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बसंत

बसंत

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बसंत की बहार आई

इस धारा को हल्दी से रंगाई

फागुन भी बेईमान पीछे पीछे आया

कहीं पीला तो कहीं लाल रंग लाया


सावन की हरियाली गई

और गुम हो गए सर्दी के ओस के मोती

बसंत की बहार आई

इस धरा को हल्दी से रंगाई


व्यापार के लिए तुम कहां गए सैयां

अब व्याकुल मन एक पल भी ना माने

बसंत की हवाएं और फागुन के रंग

सब कुछ तुम्हें बुलाए


आंगन के महुए में भी आ गए नए पत्ते

और सारी अमराई बोरई

सब कुछ तुम्हें बुलाए

बसंत की बहार आई

इस धरा को हल्दी से रंगाई।


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